
नई दिल्ली, अनिल सिंह चौहान
केंद्र सरकार बिहार की चुनावी सियासत को हाई स्पीड ट्रैक पर दौड़ रही है। यही कारण है कि प्रदेश के विधानसभा चुनाव के अवसर पर शनिवार को दिल्ली से पटना के बीच चली वंदे भारत एक्सप्रेस में छठ महापर्व के लोकप्रिय गीतों गूंज उठे। सेमी हाई-स्पीड ट्रेन के भीतर जब यात्रियों ने छठ के मधुर लोकगीतों को सुना तो वह झूम उठे। यह नजारा केवल आस्था का नहीं, बल्कि विकास और संस्कृति के गठजोड़ का एक बड़ा संदेश बन गया।
दरअसल, बिहार की सियासत में प्रवासी मतदाता और छठ पर्व दो सबसे बड़े चुनावी फैक्टर माने जाते हैं। जब लाखों बिहारी मतदाता दिल्ली-एनसीआर समेत देश के महानगरों में कार्यरत हैं, पर्व मनाने के लिए घर लौटते हैं तो उनकी घर वापसी एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाती है। इस बार विपक्ष ने स्पेशल ट्रेनों की कमी और भीड़भाड़ को लेकर सरकार को घेरा है, वहीं वंदे भारत एक्सप्रेस का यह सफर सत्ता पक्ष के लिए विकास की रफ्तार और संस्कृति के सम्मान को एक साथ पेश करने का मौका बन गया है।
रेल यात्रियों की राय है कि यह यात्रा सिर्फ गति की नहीं बल्कि भावनाओं के जुड़ाव की रही। वंदे भारत की एयरलाइन जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं (जीपीएस आधारित सूचना प्रणाली, आरामदायक सीटें और कवच सुरक्षा प्रणाली) यात्रियों को एक तरफ आधुनिक भारत का अहसास कराती हैं, तो दूसरी तरफ ट्रेन के कोच में गूँजते छठी मइया के गीत मिट्टी की महक को जीवंत कर देते हैं।
चुनावी मौसम में रेलवे की यह पहल, जहाँ एक ओर सरकार के डबल इंजन मॉडल पर उठते सवालों को शांत करने की कोशिश करती दिखती है, वहीं यह भी दर्शाती है कि आधुनिकता के रथ पर सवार होकर भी जड़ों से जुड़ना कितना मायने रखता है। देखने वाली बात यह है कि वंदे भारत एक्सप्रेस का यह सुखद अनुभव, और उसमें गूंजते छठ के लोकगीत बिहार के परदेसी बाबू के मन को साधकर आगामी विधानसभा चुनाव एनडीए के लिए निर्णायक साबित होंगे? इस सवाल का जवाब तो 14 नवंबर को मतगणना के दिन ही मिलेगा, लेकिन इतना तय है कि छठ और सियासत का यह संगम इस बार बेहद रोचक मोड़ पर आ गया है।
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