
नई दिल्ली, अनिल सिंह चौहान
बिलासपुर ट्रेन हादसे ने भारतीय रेल के सुरक्षित ट्रेन परिचालन के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। रेलवे का दावा है कि मेमू लोकल ट्रेन के लोको पॉयलेट व सहायक लोको पॉयलेट ने लाल सिग्नल को पार करते हुए आगे खड़ी मालगाड़ी पर पीछे से टक्कर मार दी। जिससे दोनों पॉयलेट सहित कुल आठ रेल यात्रियों की मृत्यु हो गई। वहीं, रेलवे विशेषज्ञों का तर्क है कि रेल संरक्षा कार्यो को आउठ सोर्स करने के कारण ट्रेन परिचाल सुरक्षित नहीं रह गया है।
रेलवे बोर्ड का दावा है कि मंगलवार को मेमू लोकल ट्रेन (कोरबा-बिलासपुर पैसेंजर) के लोको पॉयलेट विद्यासागर व सहायक लोको पॉयलेट रश्मी राज (दोनों मृतक) ने लाल सिग्नल की अनदेखी करते हुए 60 किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से आगे खड़ी मालागाड़ी मे टक्कर मार दी। विशेषज्ञों का तर्क कि नियमत: सुरक्षित ट्रेन चलाने के लिए ऑटोमैटिक सिग्नल सिस्टम में पहले स्टार्टर, एडवांस ग्रीन, डबल यलो, यलो फिर लाल होता है। रेलवे बोर्ड के अनुसार दोनों पॉयलेट ने डबल यलो, यलो फिर लाल सिग्नल तोड़कर टक्कर मारी है।
उनका तर्क है कि जहां पर मेमू ट्रेन व मालगाडी की भिड़ंत हुई वह ट्रैक बिल्कुल सीधा है। सिग्नल की अनेदखी मान भी ली जाए तो 55 किलोमीटर की रफ्तार पर दोनों पॉयलेट को आगे खड़ी मालगाड़ी नजर नहीं आई यह बात समझ से परे है। शाम के चार बजे साफ मौसम में दोनों पॉयलेट को मालगाड़ी क्यो नजर नही आई। मेमू लोकल ट्रेन तीन फेस की है, इसमें डायनेमिक (इलेक्ट्रिकल) एयर ब्रेकिंग सिस्टम हैं, जोकि महज 200-300 मीटर पर ट्रेन रोक देते हैं।
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रेलवे बोर्ड के पूर्व यातायात सदस्य श्रीप्रकाश ने दैनिक महालक्ष्मी भाग्योदय को बताया कि रेलवे भरोसे और अनुभव पर चलती है। लेकिन भारतीय रेल ने संरक्षा के कार्य (सिग्नल सिस्टम, कोचिंग, ट्रैक आदि) आउटसोर्स कर दिए हैं और जिम्मेदारी खुद ओढ़ ली है। आउट सोर्स कर्मचाारियों के पास अनुभव, कौशल, ज्ञान व तकनीकी जानकारी नहीं होती है। इसलिए उन पर रेलवे को पूरा भरोसा नहीं करना चाहिए। बिलासपुर ट्रेन हादसे में सिग्लन सिस्टम अथा ब्रेक फेल होने की संभावना नजर आती है। हालांकि इसका पता रेल संरक्षा आयुक्त (सीआरएस) की रिपोर्ट आने के बाद पता चलेगा। रेलवे को संरक्षा कार्य अपने हाथों में लेना चाहिए। तभी सुरक्षित ट्रेन परिचालन संभव होगा।
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